“कुछ ऐसा इक़ वतन है मेरा”

गुलिस्ताँ में इख़्तिलात-ए-रंगूबू से प्यारा,
कुछ ऐसा इक़ वतन है मेरा|

हिन्द जिसके क़दमों में करता है सज़दा,
हिमालय जिसका सरताज़ बन है सजता,
फिज़ाओं की खुशबुएँ जहाँ,
शहीदों का बख़ान किया करती हैं,
नदियाँ जिसकी ज़मीं को,
पल-पल सींचा करती हैं,
मिट्टी की सौंधी महक,
जहाँ अश्कों की निशानी है,
जहाँ हर गली-कूचे में लिखी,
शहादत की कहानी है,
दिल में हर किसी के,
जहाँ हिंदुस्तान है बसता!

गुलिस्ताँ में इख़्तिलत-ए-रंगूबू से प्यारा
कुछ ऐसा इक़ वतन है मेरा|

जिस वतन की आज़ादी के लिए,
कई यार बलिदान हुए,
खुली हवाओं में साँस लेने को,
जहाँ कई लहु क़ुर्बान हुए,
जहाँ गुलामी की बेड़ियों को पिघलाने,
न जाने कितने बर्फ़ से आफ़ताब हुए,
जब भी शान में इसके,
थोड़ी भी आँच आयी है,
क्या हिंदू, क्या मुसलमान,
सबने जानें गँवाई हैं,
हर किसी की ज़ुबाँ पर,
जहाँ मोहब्बत है रहता!

गुलिस्ताँ में इख़्तिलात-ए-रंगूबू से प्यारा,
कुछ ऐसा इक़ वतन है मेरा|

काश्तकार जहाँ हर रोज़ पसीने की रोटी से,
आवाम-ए-हिन्द की भूख मिटाया करते हैं,
फौज़ी जहाँ अपनी जान निसार करने को,
खून की शमां हरदम जलाया करते हैं,
इंक़लाब की कश्ती में बैठा हर आदमी,
जहाँ गम-ए-दौरां से टकरा जाया करते हैं,
अँधेरे ग़ुबारों में जहां
चिराग-ए-उम्मीद का रहता है बसेरा!

गुलिस्ताँ में इख़्तिलात-ए-रंगूबू से प्यारा
कुछ ऐसा इक़ वतन है मेरा|

हर घर में जहाँ खुशियाँ आबाद रहती हैं,
मंदिर-मस्ज़िद जिसकी शान हुआ करती है,
जिसके दरवाज़े हर किसी के लिए खुले रहते हैं,
जहाँ ईद-दीवाली सभी मिलके मनाया करते हैं,
जिस मुल्क़ के वासी,
मेहमान को ख़ुदा समझते हैं,
जिसकी बुलंदियों के चर्चे,
पूरे जहाँ में हुआ करते हैं,
जहाँ हर पहर रहता है,
उम्मीदों का सवेरा!

गुलिस्ताँ में इख़्तिलात-ए-रंगूबू से प्यारा,
कुछ ऐसा इक़ वतन है मेरा|

-कबीरा

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